IIT BHU में ताइवान जैसा कमाल, छात्रों ने 5 महीने में बना दी सिलिकॉन चिप

वाराणसी। दुनिया के सेमीकंडक्टर उद्योग में ताइवान का दबदबा माना जाता है, लेकिन अब भारत भी इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT-BHU) के इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग विभाग के छात्रों ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की है जिसने न केवल संस्थान बल्कि पूरे देश का गौरव बढ़ाया है। बीटेक द्वितीय वर्ष के छात्रों की टीम ने मात्र पांच महीनों में सफलतापूर्वक एक सिलिकॉन चिप विकसित कर इतिहास रच दिया है।

यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष मानी जा रही है क्योंकि भारत में आमतौर पर इस प्रकार की सेमीकंडक्टर और IC डिजाइन परियोजनाएं पोस्ट ग्रेजुएशन या रिसर्च स्तर पर की जाती हैं। लेकिन IIT BHU के स्नातक छात्रों ने संपूर्ण इंटीग्रेटेड सर्किट डिजाइन चक्र पूरा करते हुए सिलिकॉन टेप-आउट तक पहुंचने में सफलता प्राप्त की है।

इस परियोजना में अर्का कर, मिथिल दमाणिया, नीरज हरियानी, कनागिरी श्रीथन, मौलिक बोस, अनुज पांडेय, आदित्य मेहरा, सेतुरत्नम और अन्य छात्रों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टीम ने 64-पॉइंट फास्ट फूरियर ट्रांसफॉर्म (FFT) हार्डवेयर एक्सेलरेटर चिप विकसित की है। यह चिप आधुनिक डिजिटल सिग्नल प्रोसेसिंग सिस्टम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।

छात्रों द्वारा विकसित यह चिप 130-नैनोमीटर SKY130 प्रोसेस डिजाइन किट के माध्यम से तैयार की गई है और इसे निर्माण के लिए Tiny Tapeout Multi Project Wafer (MPW) कार्यक्रम में भेजा गया है। टीम के अनुसार यह चिप 10 मेगाहर्ट्ज फ्रीक्वेंसी पर कार्य करती है और 8-बिट साइनड फिक्स्ड पॉइंट डेटा रिजोल्यूशन को सपोर्ट करती है। इसका आकार लगभग 960 माइक्रोमीटर × 200 माइक्रोमीटर है।

विशेषज्ञों के अनुसार FFT तकनीक आज की लगभग हर आधुनिक डिजिटल तकनीक की रीढ़ बन चुकी है। मोबाइल नेटवर्क, 5G संचार, वीडियो स्ट्रीमिंग, GPS नेविगेशन, MRI स्कैनिंग, रडार सिस्टम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में इसका व्यापक उपयोग होता है। यही कारण है कि इस चिप का विकास केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं बल्कि भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

यह चिप मोबाइल और वायरलेस संचार को अधिक तेज और विश्वसनीय बनाने में मदद करेगी। साथ ही मेडिकल इमेजिंग सिस्टम की गति और सटीकता बढ़ाने, AI आधारित एप्लिकेशन को अधिक ऊर्जा-कुशल बनाने और उन्नत रडार एवं संचार प्रणालियों को मजबूत करने में भी उपयोगी साबित हो सकती है।

परियोजना के फ्रंट-एंड डिजाइन का नेतृत्व अर्का कर, मिथिल दमाणिया, नीरज हरियानी और कनागिरी श्रीथन ने किया, जबकि बैक-एंड डिजाइन और कार्यान्वयन का दायित्व आदित्य मेहरा, अनुज पांडेय, मौलिक बोस और सेतुरत्नम के.एस. ने संभाला। वरिष्ठ छात्रों पुनीत मकवाना और चैतन्य गंबाली ने तकनीकी सहयोग और मार्गदर्शन प्रदान किया।

इस सफलता के पीछे विभाग के पूर्व छात्रों का भी बड़ा योगदान रहा। वर्ष 1975 से 2025 तक के विभिन्न बैचों के एलुमनाई ने AURA Lab की स्थापना, तकनीकी सहायता और संसाधन उपलब्ध कराने में सहयोग दिया। संस्थान ने भी टेप-आउट और फैब्रिकेशन गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की।

परियोजना के संकाय मार्गदर्शक डॉ. अंकित अरोड़ा और डॉ. मुरलीकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा कि UGRA (Undergraduate Research Avenue) पहल के अंतर्गत भविष्य में और भी उन्नत हार्डवेयर मॉड्यूल विकसित किए जाएंगे। विभागाध्यक्ष प्रो. अमृतांशु पांडेय के अनुसार यह उपलब्धि साबित करती है कि उचित मार्गदर्शन और संसाधन मिलने पर युवा छात्र भी विश्वस्तरीय तकनीकी परिणाम दे सकते हैं।

आईआईटी बीएचयू के निदेशक प्रो. अमित पात्रा ने कहा कि यह उपलब्धि संस्थान में बढ़ते शोध, नवाचार और सेमीकंडक्टर डिजाइन पर फोकस को दर्शाती है। AURA Lab और UGRA जैसी पहलें छात्रों को केवल तकनीक सीखने ही नहीं बल्कि नई तकनीक विकसित करने का अवसर भी प्रदान कर रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत सरकार की सेमीकंडक्टर मिशन योजना और ऐसे छात्र-नेतृत्व वाले नवाचार भविष्य में देश को वैश्विक चिप निर्माण और डिजाइन के क्षेत्र में मजबूत पहचान दिला सकते हैं। वर्तमान में दुनिया की 60 प्रतिशत से अधिक सेमीकंडक्टर चिप्स और

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