महासमुंद LPG घोटाले का मास्टरमाइंड निकला खाद्य अधिकारी: 92 टन गैस की डील, 3 दिन में खाली किए 6 टैंकर

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में सामने आए करोड़ों रुपए के एलपीजी घोटाले में पुलिस ने बड़ा खुलासा किया है। जांच में जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव को पूरे सिंडिकेट का मास्टरमाइंड बताया गया है। पुलिस के अनुसार, आरंग के एक ढाबे में 92 टन गैस की डील हुई और सिर्फ तीन दिनों के भीतर 6 गैस कैप्सूल ट्रकों से करीब डेढ़ करोड़ रुपए की एलपीजी निकालकर बेच दी गई।

मामला दिसंबर 2025 का है, जब सिंघोड़ा थाना क्षेत्र में एलपीजी से भरे 6 कैप्सूल ट्रक जब्त किए गए थे। सुरक्षा कारणों से इन्हें सुरक्षित स्थान पर रखने की जिम्मेदारी खाद्य विभाग को सौंपी गई। यहीं से गैस गबन की पूरी योजना तैयार की गई।

पुलिस जांच के अनुसार, 23 मार्च 2026 को आरंग के एक ढाबे में गुप्त बैठक हुई। इसमें जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, गौरव गैस एजेंसी के संचालक पंकज चंद्राकर और अन्य आरोपी शामिल हुए। बैठक में जब्त ट्रकों में भरी गैस को अवैध रूप से निकालकर बेचने की रणनीति बनाई गई।

26 मार्च को अजय यादव और पंकज चंद्राकर सिंघोड़ा थाना पहुंचे और ट्रकों में भरी गैस का आकलन किया। पुलिस के मुताबिक, इन ट्रकों में लगभग 102 से 105 मीट्रिक टन गैस मौजूद थी। उसी रात रायपुर के विभिन्न गैस कारोबारियों से संपर्क किया गया और ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स के साथ 80 लाख रुपए में सौदा तय हुआ।

30 मार्च 2026 को खाद्य विभाग के अधिकारियों ने सुपुर्दनामा के आधार पर छह कैप्सूल ट्रकों को सिंघोड़ा से अभनपुर स्थित प्लांट तक पहुंचाया। इसके बाद सुनियोजित तरीके से गैस निकालने का खेल शुरू हुआ।

पुलिस के अनुसार, 31 मार्च की रात दो कैप्सूल खाली किए गए। इसके बाद 1 अप्रैल और 5 अप्रैल की रात बाकी ट्रकों से भी गैस निकाली गई। कुल तीन दिनों में लगभग 92 टन एलपीजी गैस निकाल ली गई। यह गैस प्लांट के स्थायी बुलेट, निजी टैंकरों और अन्य एजेंसियों में ट्रांसफर की गई।

जांच में सबसे अहम सवाल यह था कि सुपुर्दनामा मिलने के तुरंत बाद ट्रकों का वजन क्यों नहीं कराया गया। सिंघोड़ा से अभनपुर तक करीब 200 किलोमीटर की दूरी में 15 से अधिक धर्मकांटे मौजूद थे, लेकिन किसी भी स्थान पर वजन नहीं कराया गया। पुलिस के मुताबिक, यह देरी जानबूझकर की गई ताकि पहले गैस निकाल ली जाए।

6 कैप्सूल ट्रकों को प्लांट से करीब 200 मीटर दूर पार्किंग में खड़ा किया गया। पांच ट्रकों का वजन 6 अप्रैल को और अंतिम ट्रक का वजन 8 अप्रैल को कराया गया। तब तक अधिकांश गैस निकाली जा चुकी थी।

दस्तावेजों की जांच में बड़े वित्तीय अनियमितता के प्रमाण भी मिले। रिकॉर्ड के अनुसार, अप्रैल माह में ठाकुर पेट्रोकेमिकल्स ने केवल 47 टन एलपीजी खरीदी थी, जबकि बिक्री 107 टन दिखाई गई। यानी लगभग 60 टन गैस ऐसी बेची गई जिसकी कोई वैध खरीद दर्ज नहीं थी।

पुलिस ने यह भी पाया कि रायपुर और आसपास की कई एजेंसियों को बिना पक्के बिल के कच्चे चालान पर 4 से 6 टन तक गैस सप्लाई की गई। इससे कालाबाजारी के संगठित नेटवर्क की पुष्टि हुई।

महासमुंद पुलिस के मुताबिक, आरोपियों ने पूरे मामले का दोष पुलिस पर मढ़ने की योजना भी बनाई थी। 20 अप्रैल को आरंग के एक ढाबे में फिर बैठक हुई, जिसमें सभी ने एक जैसा बयान देने और जांच को भ्रमित करने की रणनीति बनाई।

साक्ष्य मिटाने के लिए प्लांट के प्रवेश रजिस्टर से अप्रैल महीने का रिकॉर्ड गायब कर दिया गया। बिना बिल खरीद-बिक्री से जुड़े दस्तावेज भी हटा दिए गए। पुलिस का कहना है कि पूछताछ शुरू होते ही रिकॉर्ड से छेड़छाड़ की गई।

महासमुंद पुलिस की 40 सदस्यीय टीम ने 15 दिनों तक कॉल डिटेल रिकॉर्ड, तकनीकी विश्लेषण, दस्तावेजों की जांच और वैज्ञानिक पूछताछ के आधार पर पूरे घोटाले का पर्दाफाश किया। तकनीकी रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि किसी भी कैप्सूल में लीकेज नहीं था और प्राकृतिक रूप से इतनी बड़ी मात्रा में गैस खत्म होना संभव नहीं था।

पुलिस ने जिला खाद्य अधिकारी अजय यादव, गौरव गैस ए

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