छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर में इन दिनों आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में ‘मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ के कथित प्राचीन अवशेषों के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। इस विशेष आयोजन ने न केवल धार्मिक भावनाओं को गहराई से स्पर्श किया, बल्कि लोगों में प्राचीन भारतीय इतिहास और विज्ञान के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ा दी।यह आयोजन Art of Living Foundation छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित राज्यव्यापी दर्शन यात्रा का हिस्सा है, जो 20 से 30 अप्रैल तक प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित की जा रही है। इस यात्रा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को इन प्राचीन अवशेषों के दर्शन कराना और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ना है।आस्था का केंद्र बना गुंडिचा मंडपभिलाई के सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में आयोजित इस कार्यक्रम में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। दूर-दूर से आए भक्तों ने विधिवत पूजा-अर्चना की और सत्संग में भाग लिया। आयोजन स्थल पर भक्ति संगीत, मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक संवाद का वातावरण बना रहा, जिसने श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया।कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वे अवशेष रहे, जिन्हें ‘प्राचीन मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ का हिस्सा बताया जा रहा है। इन अवशेषों को लेकर एक परंपरागत कथा भी सामने आई, जिसने श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा कर दिया।100 साल बाद सामने आए अवशेषों की कथाबताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में Mahmud of Ghazni के आक्रमण के बाद सोमनाथ मंदिर के कुछ हिस्सों को दक्षिण भारत के अग्निहोत्री परिवारों ने सुरक्षित रखा था। यह भी दावा किया जाता है कि 1924 में कांची के शंकराचार्य Jayendra Saraswathi ने भविष्यवाणी की थी कि इन अवशेषों को 100 वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।भविष्यवाणी के अनुसार, 100 साल पूरे होने के बाद इन्हें एक ऐसे संत को सौंपा जाएगा, जिनके नाम में ‘शंकर’ जुड़ा होगा। इसी क्रम में जनवरी 2025 में इन अवशेषों को आध्यात्मिक गुरु Sri Sri Ravi Shankar को सौंपा गया।इस परंपरागत कथा को आयोजन के दौरान विस्तार से बताया गया, जिसने श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण पैदा किया।चुंबकीय शक्ति और प्राचीन विज्ञान का रहस्यसोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। ऐतिहासिक उल्लेखों में यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में यह शिवलिंग हवा में स्थित रहता था। 11वीं शताब्दी के विद्वान Al-Biruni ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में इसका उल्लेख किया है कि गर्भगृह में शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में प्रतीत होता था।इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के अनुसार यह संभवतः ‘मैग्नेटिक लेविटेशन’ यानी चुंबकीय शक्ति का परिणाम रहा होगा। ऐसा माना जाता है कि मंदिर की दीवारों, छत और फर्श में विशेष प्रकार के चुंबकीय पत्थर लगाए गए थे, जिनके संतुलन से शिवलिंग हवा में स्थिर रहता था।यदि यह दावा सत्य माना जाए, तो यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग और विज्ञान की एक अद्भुत उपलब्धि मानी जा सकती है, जो उस समय की उन्नत तकनीकी समझ को दर्शाती है।वैज्ञान
छत्तीसगढ़ के भिलाई शहर में इन दिनों आस्था, इतिहास और रहस्य का अद्भुत संगम देखने को मिला, जब सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में ‘मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ के कथित प्राचीन अवशेषों के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। इस विशेष आयोजन ने न केवल धार्मिक भावनाओं को गहराई से स्पर्श किया, बल्कि लोगों में प्राचीन भारतीय इतिहास और विज्ञान के प्रति जिज्ञासा भी बढ़ा दी।
यह आयोजन Art of Living Foundation छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित राज्यव्यापी दर्शन यात्रा का हिस्सा है, जो 20 से 30 अप्रैल तक प्रदेश के विभिन्न जिलों में आयोजित की जा रही है। इस यात्रा का उद्देश्य श्रद्धालुओं को इन प्राचीन अवशेषों के दर्शन कराना और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ना है।
भिलाई के सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में आयोजित इस कार्यक्रम में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें देखने को मिलीं। दूर-दूर से आए भक्तों ने विधिवत पूजा-अर्चना की और सत्संग में भाग लिया। आयोजन स्थल पर भक्ति संगीत, मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक संवाद का वातावरण बना रहा, जिसने श्रद्धालुओं को एक अलग ही आध्यात्मिक अनुभव प्रदान किया।
कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वे अवशेष रहे, जिन्हें ‘प्राचीन मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ का हिस्सा बताया जा रहा है। इन अवशेषों को लेकर एक परंपरागत कथा भी सामने आई, जिसने श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा कर दिया।
बताया जाता है कि 11वीं शताब्दी में Mahmud of Ghazni के आक्रमण के बाद सोमनाथ मंदिर के कुछ हिस्सों को दक्षिण भारत के अग्निहोत्री परिवारों ने सुरक्षित रखा था। यह भी दावा किया जाता है कि 1924 में कांची के शंकराचार्य Jayendra Saraswathi ने भविष्यवाणी की थी कि इन अवशेषों को 100 वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
भविष्यवाणी के अनुसार, 100 साल पूरे होने के बाद इन्हें एक ऐसे संत को सौंपा जाएगा, जिनके नाम में ‘शंकर’ जुड़ा होगा। इसी क्रम में जनवरी 2025 में इन अवशेषों को आध्यात्मिक गुरु Sri Sri Ravi Shankar को सौंपा गया।
इस परंपरागत कथा को आयोजन के दौरान विस्तार से बताया गया, जिसने श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण पैदा किया।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। ऐतिहासिक उल्लेखों में यह भी कहा जाता है कि प्राचीन समय में यह शिवलिंग हवा में स्थित रहता था। 11वीं शताब्दी के विद्वान Al-Biruni ने भी अपने यात्रा वृत्तांत में इसका उल्लेख किया है कि गर्भगृह में शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में प्रतीत होता था।
इतिहासकारों और वैज्ञानिकों के अनुसार यह संभवतः ‘मैग्नेटिक लेविटेशन’ यानी चुंबकीय शक्ति का परिणाम रहा होगा। ऐसा माना जाता है कि मंदिर की दीवारों, छत और फर्श में विशेष प्रकार के चुंबकीय पत्थर लगाए गए थे, जिनके संतुलन से शिवलिंग हवा में स्थिर रहता था।
यदि यह दावा सत्य माना जाए, तो यह प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग और विज्ञान की एक अद्भुत उपलब्धि मानी जा सकती है, जो उस समय की उन्नत तकनीकी समझ को दर्शाती है।
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