31 लाख की योजना कागजों में पूरी, लेकिन पाइपलाइन सूखी; अंजोरा समेत कई गांवों में पानी के लिए हाहाकारदुर्ग। जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर नगपुरा के पास स्थित अंजोरा (ढाबा) गांव आज भीषण जल संकट से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि यहां “शराब सस्ती और पानी महंगा” जैसी कड़वी हकीकत रोज सामने आ रही है।करीब 3000 की आबादी वाले इस गांव में पीने के पानी का एकमात्र सहारा सिर्फ एक 1 एचपी का बोरवेल है। इसके चलते ग्रामीणों को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।गांव में हर दिन सुबह 4 बजे से ही पानी के लिए लंबी कतार लग जाती है, जो रात 10-11 बजे तक जारी रहती है। छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग तक घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं।पानी लाने में ही पूरा दिन निकल जाने से मजदूरी, खेती और बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है।ग्रामीणों के विरोध के बाद प्रशासन ने 31 लाख रुपए की लागत से शिवनाथ नदी से पानी लाने की योजना को मंजूरी दी थी।अमृत मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई गई और घर-घर नल कनेक्शन भी दिए गए, लेकिन आज तक पाइपलाइन में पानी नहीं पहुंचा।ग्रामीणों का आरोप है कि योजना कागजों में पूरी दिखा दी गई, जबकि जमीनी हकीकत शून्य है।अंजोरा ही नहीं, बल्कि पाटन क्षेत्र के औरी, उतई थाना क्षेत्र के मुड़पार, मर्रा, चुनकट्टा, अचानकपुर, सेलूद और छाटा जैसे कई गांवों में जल संकट गहराता जा रहा है।नदी किनारे बसे होने के बावजूद लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा।गांव में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां पानी के लिए हाहाकार मचा है, वहीं अवैध शराब खुलेआम बिक रही है।ग्रामीणों का कहना है कि गांव में 8-10 लोग इस कारोबार से जुड़े हैं और हर गली में शराब आसानी से मिल जाती है। इससे युवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है।ग्रामीण धर्मेश देशमुख का कहना है कि “31 लाख रुपए पानी की तरह बह गए, लेकिन गांव वालों को एक बूंद भी नहीं मिली।”वहीं उपसरपंच नरेंद्र धनकर का कहना है कि यदि योजना समय पर शुरू होती, तो आज यह संकट नहीं होता।पुलिस और प्रशासन का दावा है कि अवैध नशे के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी हालात इससे बिल्कुल अलग हैं और अवैध शराब पर कोई ठोस रोक नहीं लग पा रही है।ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो वे भूख हड़ताल और उग्र आंदोलन करेंगे।साथ ही उन्होंने पाइपलाइन निर्माण में भ्रष्टाचार की जांच की मांग भी की है।अंजोरा गांव की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जहां योजनाएं कागजों में पूरी हो जाती हैं, लेकिन लोगों तक उनका लाभ नहीं पहुंचता। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां एक ओर गांव में पानी के लिए हाहाकार मचा है, वहीं अवैध शराब खुलेआम बिक रही है। हर गली-मोहल्ले में शराब आसानी से मिल जाती है, जिससे युवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन चाहे तो अवैध शराब पर तुरंत रोक लग सकती है, लेकिन पानी जैसी बुनियादी जरूरत अब भी अधूरी है।एएसपी मणिशंकर चंद्रा का कहना है कि जिले में अवैध नशे के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है और नियमित गश्त हो रही है। उन्होंने दावा किया कि दुर्ग जिले में सबसे ज्यादा कार्रवाई की
दुर्ग। जिला मुख्यालय से महज 15 किलोमीटर दूर नगपुरा के पास स्थित अंजोरा (ढाबा) गांव आज भीषण जल संकट से जूझ रहा है। हालात ऐसे हैं कि यहां “शराब सस्ती और पानी महंगा” जैसी कड़वी हकीकत रोज सामने आ रही है।
करीब 3000 की आबादी वाले इस गांव में पीने के पानी का एकमात्र सहारा सिर्फ एक 1 एचपी का बोरवेल है। इसके चलते ग्रामीणों को रोजाना भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
गांव में हर दिन सुबह 4 बजे से ही पानी के लिए लंबी कतार लग जाती है, जो रात 10-11 बजे तक जारी रहती है। छोटे बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्ग तक घंटों लाइन में खड़े रहने को मजबूर हैं।
पानी लाने में ही पूरा दिन निकल जाने से मजदूरी, खेती और बच्चों की पढ़ाई पर बुरा असर पड़ रहा है।
ग्रामीणों के विरोध के बाद प्रशासन ने 31 लाख रुपए की लागत से शिवनाथ नदी से पानी लाने की योजना को मंजूरी दी थी।
अमृत मिशन के तहत पाइपलाइन बिछाई गई और घर-घर नल कनेक्शन भी दिए गए, लेकिन आज तक पाइपलाइन में पानी नहीं पहुंचा।
ग्रामीणों का आरोप है कि योजना कागजों में पूरी दिखा दी गई, जबकि जमीनी हकीकत शून्य है।
अंजोरा ही नहीं, बल्कि पाटन क्षेत्र के औरी, उतई थाना क्षेत्र के मुड़पार, मर्रा, चुनकट्टा, अचानकपुर, सेलूद और छाटा जैसे कई गांवों में जल संकट गहराता जा रहा है।
नदी किनारे बसे होने के बावजूद लोगों को पीने का पानी नहीं मिल रहा।
गांव में सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां पानी के लिए हाहाकार मचा है, वहीं अवैध शराब खुलेआम बिक रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि गांव में 8-10 लोग इस कारोबार से जुड़े हैं और हर गली में शराब आसानी से मिल जाती है। इससे युवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है।
ग्रामीण धर्मेश देशमुख का कहना है कि “31 लाख रुपए पानी की तरह बह गए, लेकिन गांव वालों को एक बूंद भी नहीं मिली।”
वहीं उपसरपंच नरेंद्र धनकर का कहना है कि यदि योजना समय पर शुरू होती, तो आज यह संकट नहीं होता।
पुलिस और प्रशासन का दावा है कि अवैध नशे के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है।
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि जमीनी हालात इससे बिल्कुल अलग हैं और अवैध शराब पर कोई ठोस रोक नहीं लग पा रही है।
ग्रामीणों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपकर चेतावनी दी है कि यदि जल्द समाधान नहीं हुआ, तो वे भूख हड़ताल और उग्र आंदोलन करेंगे।
साथ ही उन्होंने पाइपलाइन निर्माण में भ्रष्टाचार की जांच की मांग भी की है।
अंजोरा गांव की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की है जहां योजनाएं कागजों में पूरी हो जाती हैं, लेकिन लोगों तक उनका लाभ नहीं पहुंचता। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जहां एक ओर गांव में पानी के लिए हाहाकार मचा है, वहीं अवैध शराब खुलेआम बिक रही है। हर गली-मोहल्ले में शराब आसानी से मिल जाती है, जिससे युवाओं पर बुरा असर पड़ रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन चाहे तो अवैध शराब पर तुरंत रोक लग सकती है, लेकिन पानी जैसी बुनियादी जरूरत अब भी अधूरी है।
एएसपी मणिशंकर चंद्रा का कहना है कि जिले में अवैध नशे के खिलाफ लगातार कार्रवाई की जा रही है और नियमित गश्त हो रही है। उन्होंने दावा किया कि दुर्ग जिले में सबसे ज्यादा कार्रवाई की
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