Amit Jogi को उम्रकैद: Ramavatar Jaggi murder case में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला 23 साल पुराने हत्याकांड में बड़ा उलटफेर: Amit Jogi दोषी, 3 हफ्ते में सरेंडर का आदेश

 बिलासपुर : छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बहुचर्चित एनसीपी नेता रामावतार जग्गी हत्याकांड मामले में आरोपी अमित जोगी को उम्र कैद की सजा सुनाई है. अदालत ने 31 मई 2007 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने अमित जोगी को बरी किया था, जबकि अन्य सहआरोपियों को दोषी ठहराया गया था.

उम्रकैद की सज़ा, तीन हफ्ते में सरेंडर का आदेश

कोर्ट ने अमित जोगी को भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 120-बी के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और एक हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है, अर्थदंड अदा न करने पर छह माह अतिरिक्त कठोर कारावास का प्रावधान रखा गया है. वर्तमान में जमानत पर चल रहे अमित जोगी को हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि वे तीन सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करें, अन्यथा ट्रायल कोर्ट उन्हें हिरासत में लेकर सजा भोगने के लिए जेल भेजे.

ट्रायल कोर्ट के निर्णय पर कड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के अमित जोगी को दूसरों से अलग मानते हुए बरी करने को “पूर्णतः अवैध, गलत और साक्ष्यों के प्रतिकूल” करार दिया. कोर्ट ने कहा कि जिस साक्ष्य के आधार पर अन्य आरोपियों को साजिश का दोषी माना गया, उसी साक्ष्य को अमित जोगी के मामले में बिना ठोस कारण के खारिज कर दिया गया था.अदालत ने पाया कि पूरी साजिश का मास्टरमाइंड अमित जोगी थे, जो तत्कालीन मुख्यमंत्री के पुत्र होने के कारण प्रभावशाली स्थिति में थे. पुलिस मशीनरी पर भी असर रखते थे. कोर्ट ने ये भी कहा कि इतने बड़े स्तर पर राजनीतिक साजिश, हमलावरों की व्यवस्था, भागने के रास्ते, फर्जी आरोपियों की प्लांटिंग और शुरुआती जांच को भटकाने जैसा संगठित अपराध किसी बड़े नेतृत्व और संरक्षण के बिना संभव नहीं था.

पीड़ित पक्ष की प्रतिक्रिया और आगे की कानूनी राह

शिकायतकर्ता सतीश जग्गी की ओर से दायर पुनरीक्षण याचिका पर कोर्ट ने कहा कि अब जबकि सीबीआई की अपील स्वीकार कर ली गई है और अमित जोगी को दोषी ठहरा दिया गया है, तो उनके विरुद्ध दायर सज़ा-वृद्धि संबंधी दूसरी पुनरीक्षण याचिका निष्फल (इन्फ्रक्टुअस) हो गई है.अदालत ने रजिस्ट्ररी को निर्देश दिया है कि यह निर्णय अमित जोगी को भेजकर उन्हें सुप्रीम कोर्ट में अपील का अधिकार भी अवगत कराया जाए, ताकि वे स्वतंत्र रूप से या विधिक सहायता से इस फैसले को चुनौती दे सकें.


आपको बता दें कि हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सीबीआई की अपील और शिकायतकर्ता सतीश जग्गी की पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई की. जिसमें अदालत ने पाया कि एनसीपी की रैली को हर हाल में असफल करने और राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए मई 2003 में रायपुर स्थित ग्रीन पार्क होटल, बत्रा हाउस और तत्कालीन मुख्यमंत्री आवास में बैठकों की श्रृंखला चली.इसमें मुख्य रूप से अमित जोगी, चिमन सिंह, याह्या देबर और अभय गोयल समेत अन्य आरोपी शामिल हुए.इन्हीं बैठकों में एनसीपी को कमजोर करने और उसके कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी को रास्ते से हटाने की साज़िश रची गई.

4 जून 2003 की रात, एनसीपी कार्यालय बुढ़ापारा से निकलने के बाद रामावतार जग्गी की कार को मौदहापारा थाने के पास दो गाड़ियों ने ओवरटेक कर घेरा. आरोप है कि मारुति वैन और बोलेरो से उतरे हमलावरों ने पहले उनकी कार को नुकसान पहुंचाया और फिर चिमन सिंह ने नजदीक से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी. घटना के दौरान कार में सवार जग्गी के गले से रुद्राक्ष की माला भी उतारी गई, जो बाद में साजिश के साक्ष्यों में से एक अहम कड़ी बनी.

घटना के बाद प्रारंभिक जांच राज्य पुलिस ने की और अज्ञात आरोपियों के खिलाफ अपराध दर्ज कर कुछ लोगों को आरोपी बनाया, लेकिन ट्रायल में वे सभी बरी हो गए.बाद में जनवरी 2004 में मामला सीबीआई को सौंपा गया, जिसने जांच में पाया कि असली हमलावरों को बचाने के लिए पांच निर्दोष लोगों को ‘फर्जी आरोपी’ के रूप में खड़ा किया गया था और स्थानीय पुलिस के कुछ अधिकारी भी इस साज़िश का हिस्सा थे.


सीबीआई की जांच और गवाहों के बयान के आधार पर कोर्ट ने माना कि अमित जोगी ने चिमन सिंह को राजनीति से जुड़े कामों के लिए बुलाया, उसके ठहरने की व्यवस्था करवाई. हत्या के बाद उसे पांच लाख रुपए दिलाने की व्यवस्था भी कराई गई. ग्रीन पार्क होटल, बत्रा हाउस और सीएम हाउस की विजिटर रजिस्टर प्रविष्टियां और मोबाइल कॉल डिटेल्स से ये भी सामने आया कि साजिश के प्रमुख पात्र लगातार एक-दूसरे के संपर्क में थे. वारदात से पहले और बाद में कई बार मिले.


कब हुई

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