छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG 2026) में देशभर से आए आदिवासी खिलाड़ियों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। 19 राज्यों से पहुंचे खिलाड़ियों के बीच कुश्ती मुकाबलों में ओडिशा के युवा रेसलर अजीत भुन्या ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया है।अजीत भुन्या का यह सफर जितना प्रेरणादायक है, उतना ही संघर्षों से भरा हुआ भी है। बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले अजीत के पिता राजमिस्त्री हैं, जो दूसरों के घर बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। तीन साल पहले अजीत की मां का निधन हो गया था, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। छुट्टियों के दौरान अजीत भी अपने पिता के काम में हाथ बंटाते हैं।इन तमाम मुश्किलों के बावजूद अजीत ने हार नहीं मानी और खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में अपना पहला नेशनल गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया। इस जीत की खुशी उन्होंने सबसे पहले अपने पिता के साथ साझा की, जिससे पूरा परिवार गौरवान्वित है।अजीत की सफलता में खेल विकास प्राधिकरण के तहत चल रही एकेडमी का बड़ा योगदान रहा है, जहां उन्हें निशुल्क कोचिंग, शिक्षा और रहने-खाने की सुविधा मिल रही है। अजीत का कहना है कि अगर यह सुविधा नहीं मिलती, तो उनके लिए कुश्ती में आगे बढ़ना लगभग असंभव था, क्योंकि उनके पिता आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।अजीत ने अपने सपनों को साझा करते हुए कहा कि वे भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं। उनका सबसे बड़ा सपना है कि वे अपनी कमाई से अपने पिता के लिए एक पक्का घर बनाएं, ताकि जो पिता दूसरों के लिए घर बनाते हैं, उन्हें भी अपना घर मिल सके।अजीत की यह कहानी न केवल एक खिलाड़ी की जीत है, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सपनों को साकार करने की प्रेरणादायक मिसाल भी है।
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के अंबिकापुर में आयोजित खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स (KITG 2026) में देशभर से आए आदिवासी खिलाड़ियों के बीच जबरदस्त प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। 19 राज्यों से पहुंचे खिलाड़ियों के बीच कुश्ती मुकाबलों में ओडिशा के युवा रेसलर अजीत भुन्या ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया है।
अजीत भुन्या का यह सफर जितना प्रेरणादायक है, उतना ही संघर्षों से भरा हुआ भी है। बेहद गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाले अजीत के पिता राजमिस्त्री हैं, जो दूसरों के घर बनाकर अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। तीन साल पहले अजीत की मां का निधन हो गया था, जिसके बाद परिवार की जिम्मेदारियां और बढ़ गईं। छुट्टियों के दौरान अजीत भी अपने पिता के काम में हाथ बंटाते हैं।
इन तमाम मुश्किलों के बावजूद अजीत ने हार नहीं मानी और खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स में अपना पहला नेशनल गोल्ड जीतकर इतिहास रच दिया। इस जीत की खुशी उन्होंने सबसे पहले अपने पिता के साथ साझा की, जिससे पूरा परिवार गौरवान्वित है।
अजीत की सफलता में खेल विकास प्राधिकरण के तहत चल रही एकेडमी का बड़ा योगदान रहा है, जहां उन्हें निशुल्क कोचिंग, शिक्षा और रहने-खाने की सुविधा मिल रही है। अजीत का कहना है कि अगर यह सुविधा नहीं मिलती, तो उनके लिए कुश्ती में आगे बढ़ना लगभग असंभव था, क्योंकि उनके पिता आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं।
अजीत ने अपने सपनों को साझा करते हुए कहा कि वे भविष्य में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं। उनका सबसे बड़ा सपना है कि वे अपनी कमाई से अपने पिता के लिए एक पक्का घर बनाएं, ताकि जो पिता दूसरों के लिए घर बनाते हैं, उन्हें भी अपना घर मिल सके।
अजीत की यह कहानी न केवल एक खिलाड़ी की जीत है, बल्कि संघर्ष, समर्पण और सपनों को साकार करने की प्रेरणादायक मिसाल भी है।
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