भारत में LPG का बढ़ता दबदबा: उज्ज्वला योजना से गांव-गांव पहुंचा गैस, PNG अभी भी शहरों तक सीमित

नई दिल्ली: भारत में घरों में खाना पकाने के लिए लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। पिछले एक दशक में सरकारी योजनाओं और मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क के चलते LPG देश के दूर-दराज के इलाकों तक पहुंच चुका है। हालांकि, पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) का विस्तार अभी भी सीमित है और यह मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों तक ही सीमित है।

राष्ट्रीय ऊर्जा डेटा के विश्लेषण से साफ है कि भारत में LPG और PNG के उपयोग के बीच बड़ा अंतर बना हुआ है। जहां LPG सिलेंडर को आसानी से देश के किसी भी हिस्से में पहुंचाया जा सकता है, वहीं PNG के लिए बड़े पैमाने पर पाइपलाइन इंफ्रास्ट्रक्चर, सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन और शहरी योजना की जरूरत होती है।

सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUY) ने इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। इस योजना के तहत ग्रामीण और कम आय वाले परिवारों को मुफ्त या सब्सिडी पर LPG कनेक्शन दिए गए, जिससे पारंपरिक ईंधनों जैसे लकड़ी, गोबर और कृषि अपशिष्ट पर निर्भरता में बड़ी कमी आई।

पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में LPG की खपत 1998-99 में 446,000 मीट्रिक टन से बढ़कर 2025-26 तक लगभग छह गुना तक पहुंचने का अनुमान है। खासतौर पर 2000 और 2010 के दशक में LPG खपत में तेज वृद्धि दर्ज की गई, जब सालाना ग्रोथ 8% से 11% के बीच रही।

2016-17 में उज्ज्वला योजना के लॉन्च के बाद LPG उपयोग में एक बड़ा उछाल आया, जब साल-दर-साल खपत में लगभग 10.1% की वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि, 2020 के बाद इस वृद्धि में कमी आई है, क्योंकि देश के अधिकांश घरों तक LPG कनेक्शन पहले ही पहुंच चुका है।

राज्यवार आंकड़ों की बात करें तो उत्तर प्रदेश अकेले देश के कुल LPG उपभोक्ताओं का करीब 15% हिस्सा रखता है, जो वहां की बड़ी आबादी और गैस पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है।

यह आंकड़े जहां भारत की स्वच्छ ईंधन की दिशा में सफलता को दिखाते हैं, वहीं यह भी संकेत देते हैं कि देश को गैस-आधारित अर्थव्यवस्था बनने के लिए अभी PNG जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर में लंबा सफर तय करना बाकी है।

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