मान्यता के अनुसार नई बहू की पहली होली मायके में मनाना शुभ माना जाता हैरंगों का त्योहार होली इस साल 4 मार्च को मनाया जाएगा। दुर्ग जिले में इस बार 3153 से ज्यादा नवविवाहित जोड़े अलग-अलग होली मनाएंगे। दरअसल छत्तीसगढ़ सहित ओडिशा, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई समाजों में यह परंपरा है कि शादी के बाद पहली होली नई बहू अपने मायके में मनाती है, न कि ससुराल में।मान्यता के अनुसार नई बहू को ससुराल में पहली बार होलिका दहन देखना शुभ नहीं माना जाता। संस्कृत विद्वानों के अनुसार होलिका दहन को एक तरह से मृतक संस्कार से भी जोड़ा जाता है, इसलिए नई बहू को इस दृश्य से दूर रखा जाता है। इसी वजह से परंपरा के तहत शादी के बाद पहली होली पर बेटियों को मायके भेजा जाता है।बुजुर्गों का मानना है कि सास और बहू को एक साथ पहली बार जलती हुई होली की अग्नि नहीं देखनी चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इससे दोनों के रिश्तों में खटास आ सकती है। इसलिए परिवार पहले साल इस परंपरा का पालन करते हैं।धार्मिक मान्यता के अनुसार होली भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के वध से जुड़ा पर्व है। ऐसे में नई बहुओं का मन खुशी और नए जीवन की शुरुआत से जुड़ा होता है, इसलिए उन्हें इस समय मायके में रहकर त्योहार मनाने की परंपरा चली आ रही है।जिले में हर साल लगभग 4 हजार से ज्यादा शादियां होती हैं। वहीं विवाह पंजीयन विभाग के अनुसार अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 तक 532 जोड़ों की शादियां दर्ज की गई हैं। अलग-अलग समाजों में इस परंपरा को लेकर अलग-अलग रीति-रिवाज भी देखने को मिलते हैं।कुछ समाजों में नई बहू शादी के बाद पहली होली ससुराल में खेलती है, लेकिन पहला गणगौर पूजन मायके में करती है। वहीं जैन और अन्य समाजों में पहली सावन और भादो भी मायके में बिताने की परंपरा है। महाराष्ट्र समाज में भी नई बहुओं को तय समय के अनुसार मायके भेजने की परंपरा बताई जाती है।वहीं व्यावहारिक नजरिए से देखें तो पुराने समय में यह परंपरा बेटियों को शादी के बाद त्योहार के बहाने मायके भेजने और परिवार से मिलने का एक तरीका भी माना जाता रहा है।
रंगों का त्योहार होली इस साल 4 मार्च को मनाया जाएगा। दुर्ग जिले में इस बार 3153 से ज्यादा नवविवाहित जोड़े अलग-अलग होली मनाएंगे। दरअसल छत्तीसगढ़ सहित ओडिशा, उत्तर प्रदेश और बिहार के कई समाजों में यह परंपरा है कि शादी के बाद पहली होली नई बहू अपने मायके में मनाती है, न कि ससुराल में।
मान्यता के अनुसार नई बहू को ससुराल में पहली बार होलिका दहन देखना शुभ नहीं माना जाता। संस्कृत विद्वानों के अनुसार होलिका दहन को एक तरह से मृतक संस्कार से भी जोड़ा जाता है, इसलिए नई बहू को इस दृश्य से दूर रखा जाता है। इसी वजह से परंपरा के तहत शादी के बाद पहली होली पर बेटियों को मायके भेजा जाता है।
बुजुर्गों का मानना है कि सास और बहू को एक साथ पहली बार जलती हुई होली की अग्नि नहीं देखनी चाहिए। ऐसी मान्यता है कि इससे दोनों के रिश्तों में खटास आ सकती है। इसलिए परिवार पहले साल इस परंपरा का पालन करते हैं।
धार्मिक मान्यता के अनुसार होली भक्त प्रह्लाद की रक्षा और होलिका के वध से जुड़ा पर्व है। ऐसे में नई बहुओं का मन खुशी और नए जीवन की शुरुआत से जुड़ा होता है, इसलिए उन्हें इस समय मायके में रहकर त्योहार मनाने की परंपरा चली आ रही है।
जिले में हर साल लगभग 4 हजार से ज्यादा शादियां होती हैं। वहीं विवाह पंजीयन विभाग के अनुसार अप्रैल 2025 से फरवरी 2026 तक 532 जोड़ों की शादियां दर्ज की गई हैं। अलग-अलग समाजों में इस परंपरा को लेकर अलग-अलग रीति-रिवाज भी देखने को मिलते हैं।
कुछ समाजों में नई बहू शादी के बाद पहली होली ससुराल में खेलती है, लेकिन पहला गणगौर पूजन मायके में करती है। वहीं जैन और अन्य समाजों में पहली सावन और भादो भी मायके में बिताने की परंपरा है। महाराष्ट्र समाज में भी नई बहुओं को तय समय के अनुसार मायके भेजने की परंपरा बताई जाती है।
वहीं व्यावहारिक नजरिए से देखें तो पुराने समय में यह परंपरा बेटियों को शादी के बाद त्योहार के बहाने मायके भेजने और परिवार से मिलने का एक तरीका भी माना जाता रहा है।
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