रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की जीवनरेखा मानी जाने वाली खारून नदी की बिगड़ती हालत अब बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गई है। शहर के 17 बड़े नालों का गंदा पानी नदी में मिलने और सीवरेज प्रबंधन की खामियों को लेकर विपक्ष ने सरकार पर तीखा हमला बोला है, वहीं सत्ता पक्ष के ही विधायक राजेश मूणत ने सदन में अपनी सरकार से जवाब मांगा है।बताया जा रहा है कि भाठागांव से चंदनीडीह तक कई जगहों पर नालों का गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है। शहर के घरों से निकलने वाला सीवरेज, साबुन-सोडा युक्त पानी और औद्योगिक क्षेत्र उरला का केमिकल मिश्रित पानी भी नदी में मिल रहा है, जिससे आसपास के इलाकों के लोगों के लिए स्थिति चिंताजनक हो गई है।नगर निगम में विपक्ष के नेता आकाश तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार की लापरवाही से राजधानी को स्वच्छ पानी तक नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि कई जगहों पर नाले सीधे नदी में मिल रहे हैं, जबकि आसपास धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जहां लोग इसी पानी का उपयोग कर रहे हैं।मामला नगर निगम से निकलकर विधानसभा तक पहुंच गया। सदन में विधायक राजेश मूणत ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब 7 एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध थी तो एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) 8 किलोमीटर दूर क्यों बनाया गया और इसके डीपीआर व स्थान चयन की जिम्मेदारी किसकी थी। उन्होंने दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की।इस बीच रायपुर नगर निगम के आयुक्त विश्वदीप का कहना है कि शहर में तीन एसटीपी काम कर रहे हैं और प्रदूषण नियंत्रण में है। वहीं नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने सदन में बताया कि मामले की जांच के लिए मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है और नालों के सीमांकन के निर्देश दिए गए हैं।गौरतलब है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 की रिपोर्ट में खारून नदी देश की सबसे प्रदूषित 271 नदियों की सूची में शामिल है। ऐसे में अरपा, हसदेव और महानदी के साथ खारून का नाम इस सूची में होना राज्य के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।अब सवाल यह है कि सदन से लेकर सड़क तक उठ रहे इस मुद्दे के बाद क्या राजधानी की जीवनरेखा कही जाने वाली खारून को वाकई राहत मिल पाएगी या यह बहस सिर्फ सियासत तक सीमित रह जाएगी।
बताया जा रहा है कि भाठागांव से चंदनीडीह तक कई जगहों पर नालों का गंदा पानी सीधे नदी में गिर रहा है। शहर के घरों से निकलने वाला सीवरेज, साबुन-सोडा युक्त पानी और औद्योगिक क्षेत्र उरला का केमिकल मिश्रित पानी भी नदी में मिल रहा है, जिससे आसपास के इलाकों के लोगों के लिए स्थिति चिंताजनक हो गई है।
नगर निगम में विपक्ष के नेता आकाश तिवारी ने आरोप लगाया कि सरकार की लापरवाही से राजधानी को स्वच्छ पानी तक नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि कई जगहों पर नाले सीधे नदी में मिल रहे हैं, जबकि आसपास धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं जहां लोग इसी पानी का उपयोग कर रहे हैं।
मामला नगर निगम से निकलकर विधानसभा तक पहुंच गया। सदन में विधायक राजेश मूणत ने सवाल उठाते हुए कहा कि जब 7 एकड़ सरकारी जमीन उपलब्ध थी तो एसटीपी (सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट) 8 किलोमीटर दूर क्यों बनाया गया और इसके डीपीआर व स्थान चयन की जिम्मेदारी किसकी थी। उन्होंने दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की मांग भी की।
इस बीच रायपुर नगर निगम के आयुक्त विश्वदीप का कहना है कि शहर में तीन एसटीपी काम कर रहे हैं और प्रदूषण नियंत्रण में है। वहीं नगरीय प्रशासन मंत्री अरुण साव ने सदन में बताया कि मामले की जांच के लिए मुख्य अभियंता की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है और नालों के सीमांकन के निर्देश दिए गए हैं।
गौरतलब है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की 2025 की रिपोर्ट में खारून नदी देश की सबसे प्रदूषित 271 नदियों की सूची में शामिल है। ऐसे में अरपा, हसदेव और महानदी के साथ खारून का नाम इस सूची में होना राज्य के लिए चिंता का विषय माना जा रहा है।
अब सवाल यह है कि सदन से लेकर सड़क तक उठ रहे इस मुद्दे के बाद क्या राजधानी की जीवनरेखा कही जाने वाली खारून को वाकई राहत मिल पाएगी या यह बहस सिर्फ सियासत तक सीमित रह जाएगी।
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