छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का अमरपुर गांव अपनी अनूठी और दशकों पुरानी परंपरा के कारण क्षेत्रभर में खास पहचान रखता है। जहां देशभर में होली भारतीय पंचांग के अनुसार निर्धारित तिथि पर मनाई जाती है, वहीं अमरपुर में यह त्योहार मुख्य तिथि से लगभग एक सप्ताह पहले ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।जिला मुख्यालय बैकुंठपुर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में होली का आयोजन सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। सबसे पहले विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर होलिका दहन किया जाता है। इसके बाद बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रंग-गुलाल के साथ एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हुए जमकर होली खेलते हैं। ढोलक, मंजीरे और पारंपरिक फाग गीतों की गूंज से पूरा गांव रंगमय हो उठता है।ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उन्होंने अपने बुजुर्गों को इसी तरह पहले होली मनाते देखा है और अब नई पीढ़ी भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ इस परंपरा को निभा रही है। त्योहार से पहले गांव में बैठक आयोजित कर सामूहिक रूप से तैयारियां की जाती हैं, जिससे पूरे आयोजन में एकजुटता और अनुशासन बना रहता है।अमरपुर की होली देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ जुलूस निकाला जाता है, देवल्ला में पूजा-अर्चना की जाती है और उसके बाद एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दी जाती हैं।ग्रामीणों की मान्यता है कि मुख्य तिथि से पहले होली मनाने से गांव में किसी प्रकार की अनहोनी या अप्रिय घटना नहीं होती। इसी आस्था और विश्वास के कारण यह परंपरा आज भी पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है।अमरपुर की यह अनूठी होली न केवल सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सामूहिक भागीदारी और परंपराओं के प्रति अटूट आस्था का भी जीवंत उदाहरण बन गई है।
छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का अमरपुर गांव अपनी अनूठी और दशकों पुरानी परंपरा के कारण क्षेत्रभर में खास पहचान रखता है। जहां देशभर में होली भारतीय पंचांग के अनुसार निर्धारित तिथि पर मनाई जाती है, वहीं अमरपुर में यह त्योहार मुख्य तिथि से लगभग एक सप्ताह पहले ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
जिला मुख्यालय बैकुंठपुर से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव में होली का आयोजन सामूहिक सहभागिता और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। सबसे पहले विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर होलिका दहन किया जाता है। इसके बाद बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी रंग-गुलाल के साथ एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हुए जमकर होली खेलते हैं। ढोलक, मंजीरे और पारंपरिक फाग गीतों की गूंज से पूरा गांव रंगमय हो उठता है।
ग्रामीण बताते हैं कि यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। उन्होंने अपने बुजुर्गों को इसी तरह पहले होली मनाते देखा है और अब नई पीढ़ी भी उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ इस परंपरा को निभा रही है। त्योहार से पहले गांव में बैठक आयोजित कर सामूहिक रूप से तैयारियां की जाती हैं, जिससे पूरे आयोजन में एकजुटता और अनुशासन बना रहता है।
अमरपुर की होली देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ जुलूस निकाला जाता है, देवल्ला में पूजा-अर्चना की जाती है और उसके बाद एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर पर्व की शुभकामनाएं दी जाती हैं।
ग्रामीणों की मान्यता है कि मुख्य तिथि से पहले होली मनाने से गांव में किसी प्रकार की अनहोनी या अप्रिय घटना नहीं होती। इसी आस्था और विश्वास के कारण यह परंपरा आज भी पूरी निष्ठा से निभाई जा रही है।
अमरपुर की यह अनूठी होली न केवल सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, सामूहिक भागीदारी और परंपराओं के प्रति अटूट आस्था का भी जीवंत उदाहरण बन गई है।
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