दुर्ग।दुर्ग जिले में मातृत्व अब खुशी नहीं, बल्कि डर का पर्याय बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि गर्भवती महिलाएं इलाज के लिए अस्पताल तो पहुंच रही हैं, लेकिन कई बार वे ज़िंदा घर नहीं लौट पा रहीं। बीते 9 महीनों में जिले में 19 गर्भवती और प्रसूता महिलाओं की मौत हो चुकी है। इनमें से 9 मौतें सीधे जिला अस्पताल से जुड़ी बताई जा रही हैं। यह महज आंकड़े नहीं, बल्कि 19 परिवारों का उजड़ना और 19 नवजात बच्चों का मां की ममता से वंचित हो जाना है।जामुल निवासी 22 वर्षीय लीजा मानिकपुरी को 28 नवंबर को लेबर पेन होने पर सुपेला अस्पताल लाया गया था। जांच में ब्लड प्रेशर ज्यादा पाए जाने पर उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया। जिला अस्पताल में सुरक्षित सिजेरियन ऑपरेशन के बाद उसने एक बेटे को जन्म दिया। परिजनों को लगा कि अब सब कुछ ठीक हो गया है, लेकिन इलाज के दौरान ब्लड चढ़ाते समय उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। तमाम प्रयासों के बावजूद 29 नवंबर को लीजा की मौत हो गई। एक ओर जहां परिवार की खुशियां मातम में बदल गईं, वहीं नवजात बच्चा जन्म लेते ही मां की ममता से वंचित हो गया।दूसरा मामला धमधा क्षेत्र का है। यहां 30 वर्षीय कुलेश्वरी साहू को लेबर पेन के दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) लाया गया। जांच में उसका ब्लड प्रेशर 190/140 पाया गया, जिसके बाद उसे तत्काल जिला अस्पताल रेफर किया गया। हालांकि जिला अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में उसकी मौत हो गई। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।इन मामलों को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) मनोज दानी का कहना है कि दोनों ही मामलों में मौत का कारण प्रेगनेंसी इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन, यानी गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर हो सकता है।लगातार हो रही इन मौतों ने जिले की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और रेफरल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
दुर्ग।दुर्ग जिले में मातृत्व अब खुशी नहीं, बल्कि डर का पर्याय बनता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि गर्भवती महिलाएं इलाज के लिए अस्पताल तो पहुंच रही हैं, लेकिन कई बार वे ज़िंदा घर नहीं लौट पा रहीं। बीते 9 महीनों में जिले में 19 गर्भवती और प्रसूता महिलाओं की मौत हो चुकी है। इनमें से 9 मौतें सीधे जिला अस्पताल से जुड़ी बताई जा रही हैं। यह महज आंकड़े नहीं, बल्कि 19 परिवारों का उजड़ना और 19 नवजात बच्चों का मां की ममता से वंचित हो जाना है।
जामुल निवासी 22 वर्षीय लीजा मानिकपुरी को 28 नवंबर को लेबर पेन होने पर सुपेला अस्पताल लाया गया था। जांच में ब्लड प्रेशर ज्यादा पाए जाने पर उसे जिला अस्पताल रेफर किया गया। जिला अस्पताल में सुरक्षित सिजेरियन ऑपरेशन के बाद उसने एक बेटे को जन्म दिया। परिजनों को लगा कि अब सब कुछ ठीक हो गया है, लेकिन इलाज के दौरान ब्लड चढ़ाते समय उसकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। तमाम प्रयासों के बावजूद 29 नवंबर को लीजा की मौत हो गई। एक ओर जहां परिवार की खुशियां मातम में बदल गईं, वहीं नवजात बच्चा जन्म लेते ही मां की ममता से वंचित हो गया।
दूसरा मामला धमधा क्षेत्र का है। यहां 30 वर्षीय कुलेश्वरी साहू को लेबर पेन के दौरान सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) लाया गया। जांच में उसका ब्लड प्रेशर 190/140 पाया गया, जिसके बाद उसे तत्काल जिला अस्पताल रेफर किया गया। हालांकि जिला अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में उसकी मौत हो गई। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
इन मामलों को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) मनोज दानी का कहना है कि दोनों ही मामलों में मौत का कारण प्रेगनेंसी इंड्यूस्ड हाइपरटेंशन, यानी गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक बढ़ा हुआ ब्लड प्रेशर हो सकता है।
लगातार हो रही इन मौतों ने जिले की मातृ स्वास्थ्य सेवाओं और रेफरल सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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