कलचुरी कालीन शिव मंदिर की कहानी, 6 महीने में पूरी हो जाती हर मनोकामना, कभी नहीं सूखता मंदिर परिसर में बने कुंड का पानी

देवबलोदा । छत्तीसगढ़ में कई भगवान शिव के प्राचीन व अद्भुत शिवालय मौजूद है। जो अपने आप में पौराणिक व प्राचीन काल के इतिहास को समेटे हैं। आज हम आपको ऐसे ही 13 वी शताब्दी में बने एक प्राचीन छ: मासी शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहें है जो छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में बना है।

छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में कबीरधाम जिले के भोरमदेव शिव मंदिर के बाद राजधानी रायपुर और दुर्ग के बीच भिलाई-तीन, चरोदा रेल्वेलाइन के किनारे बसे देवबलौदा गांव में 13 शताब्दी का ऐतिहासिक शिव मंदिर कई रहस्यों को साथ लिए हुए है। 

यह शिव मंदिर आश्चर्य और रहस्य से भरा है। यहां नवरंग मंडप नागर शैली में बना देवबलौदा का प्राचीन शिव मंदिर अपने आप में खास है। इस मंडप में 10 स्तम्भ हैं जिनमे शैव द्वारपाल के रूप में विभिन्न आकृतियां उकेरी गई है।इस मंडप का छत भी पत्थरों से बना है। 

कलचुरी कालीन स्थापत्य कला के मिलतें हैं सबूत राष्ट्रीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार जिले के देवबलौदा में स्थित इस शिव मंदिर का निर्माण कलचुरी राजाओं ने 13 वीं शताब्दी में कराया। मंदिर की बनावट काफी भव्य है। 

मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी भी उत्कृष्ट व आश्चर्यजनक है। मंदिर की दीवारों पर पशु, पक्षी, पेड़ पौधे व रामायण के किरदारों के साथ-साथ नित्य संगीत को भी पत्थरों पर उकेरा गया है। 

मंदिर के बरामदे को बड़े-बड़े पत्थरों के माध्यम से बनाया गया है। वही गर्भ गृह में जाने के लिए 6 फिट नीचे सीड़ियों के माध्यम से नीचे उतरना पड़ता है। शिवजी के साथ अन्य देवी देवताओं की हैं मूर्तियां मंदिर के गर्भ गृह में प्राचीन शिवलिंग आज भी विराजमान है, जिसकी पूजा पाठ प्रतिदिन विधि विधान से की जाती है। 

मंदिर के अंदर भगवान शंकर के साथ-साथ जगन्नाथ माता पार्वती समेत कई देवी-देवताओं के मूर्तियां बनी हुई है,,, वही मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान गणेश की दो भव्य प्रतिमा भी रखी गई है। मंदिर के ठीक सामने भगवान शंकर की सवारी नंदी की प्रतिमा विराजमान है,जिसे पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है। 

इसके साथ ही मंदिर के सामने पीपल पेड़ के नीचे खुदाई से मिले कई खंडित प्रतिमाओं को संरक्षित कर रखा गया है। इन मूर्तियों से कलचुरी कालीन स्थापत्य कला की पहचान की जा सकती है। कल्चुरी कालीन मूर्तिकला व धार्मिक मान्यताओं व स्थापत्य कला की जीवंत गाथा के रूप में आज भी यह प्रतिमाएं लोगों को उस काल की जानकारी दे रही है।

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